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"आज जब उसे स्कूल जाते देखती हूँ, तो दिल को सुकून मिलता है" सिकल सेल डिजीज से बोन मैरो ट्रांसप्लांट तक विरल की कहानी

Posted on: 09 JUN 2026  

|   By: मनीषा नागले

मेरा बेटा विरल लगभग चार-पाँच साल का था जब उसकी तबीयत फिर से बिगड़ गई। उसे बहुत तेज़ बुखार था जो ठीक होने का नाम नहीं ले रहा था। वैसे तो बचपन से ही वह बार-बार बीमार पड़ता था। कभी बुखार, कभी संक्रमण, कभी निमोनिया। एक बार निमोनिया होने के बाद उसकी खाँसी इतनी ज़िद्दी हो गई थी कि महीनों तक उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी।

हम हमेशा यही सोचते थे कि शायद उसकी इम्यूनिटी कमजोर है। लेकिन इस बार कुछ अलग था। हमने कई जाँचें कराईं। डॉक्टरों से सलाह ली। फिर एक दिन हमें वह खबर मिली जिसने हमारी दुनिया बदल दी—विरल को सिकल सेल डिजीज है। उस पल ऐसा लगा जैसे हमारे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो।

घर लौटकर हमने इस बीमारी के बारे में पढ़ना शुरू किया। जितना पढ़ते गए, उतना ही डर बढ़ता गया। हमें समझ नहीं आ रहा था कि हमारे छोटे से बच्चे का भविष्य कैसा होगा। बस एक ही बात मन में थी—हमें उसका सबसे अच्छा इलाज कराना है। इसी दौरान हमारे डॉक्टर ने हमें डॉ. गौरव खार्या के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वे भोपाल में महीने में एक बार बच्चों को देखते हैं। हम उनसे मिलने पहुँचे।

वहाँ हमारी मुलाकात एक ऐसे बच्चे और उसके परिवार से हुई जिसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट हो चुका था और वह अब स्वस्थ जीवन जी रहा था। उसके माता-पिता से बात करके पहली बार हमें लगा कि शायद हमारे बेटे के लिए भी उम्मीद है। जब हम डॉ. गौरव खार्या से मिले तो उनके आत्मविश्वास और अनुभव ने हमारे मन का बहुत-सा डर दूर कर दिया। हमें लगा कि अगर कोई विरल को इस बीमारी से मुक्त कर सकता है, तो वह यही टीम है।

फिर भी हम पूरी तरह आश्वस्त होना चाहते थे। हमने विरल का केस देश के कई बड़े संस्थानों में दिखाया—एम्स दिल्ली, पीजीआई चंडीगढ़ और नारायणा हेल्थ, बेंगलुरु। हर जगह हमें एक ही जवाब मिला। सिकल सेल डिजीज से स्थायी मुक्ति का सबसे प्रभावी उपचार बोन मैरो ट्रांसप्लांट है।अब फैसला हमारे हाथ में था। सौभाग्य से मेरे पति भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं, इसलिए उपचार की आर्थिक व्यवस्था अपेक्षाकृत आसान हो सकी। हमने ट्रांसप्लांट के लिए आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

सबसे बड़ी खुशखबरी तब मिली जब विरल के छोटे भाई विभर्ष का HLA मैच उसके साथ पूरा मिला।एक छोटे भाई ने अपने बड़े भाई को नई जिंदगी देने का रास्ता खोल दिया दिल्ली में विरल का बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ। वह समय हमारे जीवन का सबसे कठिन दौर था, लेकिन हमें कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया गया।

डॉ. गौरव खार्या, डॉ. निखिल, डॉ. गुरप्रीत, डॉ. गरिमा और पूरी टीम ने हर कदम पर हमारा साथ दिया। जब भी हमें किसी बात की चिंता होती, वे धैर्य से समझाते। जब हम घबराते, वे हमारा हौसला बढ़ाते।धीरे-धीरे हम भी सीखने लगे। डाइट क्या होनी चाहिए, संक्रमण से कैसे बचना है, स्वच्छता का कितना महत्व है—इन सब बातों की समझ हमें अस्पताल के उन्हीं दिनों में मिली।

आज ट्रांसप्लांट को कई वर्ष हो चुके हैं।विरल अब साढ़े सात साल का है। वह स्कूल जाता है और दूसरी कक्षा में पढ़ता है। बीमारी की वजह से उसके शुरुआती साल पढ़ाई से ज्यादा अस्पतालों में बीते, इसलिए उसे अभी बहुत कुछ सीखना है। लेकिन उसकी शरारतें देखकर कोई नहीं कह सकता कि उसने इतना कठिन सफर तय किया है।

उसे ढोकला बहुत पसंद है। चटपटा खाना भी खूब अच्छा लगता है। लेकिन साथ ही वह यह भी जानता है कि बाहर का खाना नहीं खाना है, साफ-सफाई का ध्यान रखना है, और अपनी प्लेट-कटोरी हमेशा अच्छी तरह धुली हुई होनी चाहिए। कभी-कभी मुझे लगता है कि यह छोटा बच्चा अपनी उम्र से पहले बड़ा हो गया।

लेकिन फिर उसकी कोई शरारत मुझे याद दिला देती है कि वह आज भी मेरा वही प्यारा-सा बच्चा है। एक माँ के लिए इससे बड़ा सुकून क्या हो सकता है कि वह अपने बच्चे को स्वस्थ, हँसते-खेलते और सपने देखते हुए देखे? आज जब मैं विरल को स्कूल जाते हुए देखती हूँ, दोस्तों के साथ खेलते हुए देखती हूँ, तो मन कृतज्ञता से भर जाता है।

मैं चाहती हूँ कि सिकल सेल डिजीज या ऐसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हर बच्चे तक सही इलाज पहुँचे। हर परिवार को वह जानकारी, वह सहयोग और वह उम्मीद मिले जो हमें मिली। क्योंकि कभी-कभी सही समय पर मिला इलाज सिर्फ एक बीमारी का उपचार नहीं करता—वह एक बच्चे का पूरा भविष्य बदल देता है।

व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।

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