Haploidentical Bone Marrow Transplant: From Dream to Reality

Haploidentical Bone Marrow Transplant: From Dream to Reality

Posted on: 15 MAY 2025  

|   By: अखिलेश कुमार मिश्रा

मेरा नाम अखिलेश है। मैं उत्तर प्रदेश के अयोध्या ज़िले के पास एक छोटे से गाँव में कपड़ों की दुकान चलाता हूँ। ज़िंदगी बस किसी तरह चल रही थी। सीमित आमदनी, सीमित ज़रूरतें और छोटे-छोटे सपने थे। लेकिन जब मेरा बेटा अक्षित सिर्फ चार महीने का था और उसका रंग अचानक पीला पड़ गया, वह कमज़ोर हो गया, तब हमारी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

हम उसे लेकर सबसे पहले सुलतानपुर के डॉक्टर के पास गए, फिर अयोध्या और उसके बाद लखनऊ तक पहुंचे। हर जगह एक ही बात कही गई – "आपके बेटे को कैंसर है।" ये सुनते ही ऐसा लगा जैसे किसी ने सब कुछ छीन लिया हो। मैं और मेरा परिवार पूरी तरह टूट गए थे। कुछ समय बाद एक डॉक्टर ने बताया कि ये कैंसर नहीं है, बल्कि थैलेसीमिया मेजर है। मैं जानता था कि इसका क्या मतलब है। मेरे बड़े भाई का बेटा भी थैलेसीमिया से पीड़ित था, और मैं देख चुका था कि उसकी ज़िंदगी किस संघर्ष से भरी थी – हर पंद्रह-बीस दिन में ब्लड ट्रांसफ्यूज़न, बार-बार सुइयों की चुभन, संक्रमण का डर और भविष्य को लेकर एक अनिश्चितता।

मेरी आर्थिक हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि हर महीने अस्पताल के चक्कर काट सकूं। मैं दोराहे पर था – एक तरफ बेटे की तकलीफ़, दूसरी तरफ बेबसी। एक वक़्त ऐसा आया जब मैंने सोचा कि क्या ब्लड ट्रांसफ्यूज़न करवा कर मैं उसकी और अपने बाकी के परिवार की जिंदगी और मुश्किल बना दूंगा और मैंने ठान लिया कि मैं उसका ब्लड ट्रांसफ्यूज़न नहीं करवाऊंगा और उसे जाने दूंगा।

एक रात अक्षित बहुत ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। उसका चेहरा बिल्कुल पीला पड़ गया था, सांस तेज़-तेज़ चल रही थी। उसकी मां घबरा कर रोने लगी। वो रात मैंने कभी नहीं भूली। मैंने फ़ैसला किया – अब और इंतज़ार नहीं।

मैं उसे लखनऊ के अस्पताल लेकर गया और उसका पहला ब्लड ट्रांसफ्यूज़न करवाया। वहीं से एक नए संघर्ष की शुरुआत हुई – इलाज की तलाश।

डॉक्टरों ने बताया कि थैलेसीमिया का एकमात्र स्थायी इलाज है – बोन मैरो ट्रांसप्लांट। लेकिन ये तभी संभव होता है जब HLA मैच मिल जाए। हमने पूरे परिवार की जाँच करवाई, लेकिन कोई भी मैच नहीं मिला।

आशा की एक नई किरण – आधा मेल बोन मैरो ट्रांसप्लांट

इसी बीच मुझे इंटरनेट पर एक वीडियो मिला – उसमें बताया गया था कि अब ऐसे बच्चों का इलाज "हाप्लो आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट" से भी हो सकता है। यानी अगर माता-पिता का HLA केवल 50% भी मेल खाता है, तो भी ट्रांसप्लांट संभव है।

मैंने देश के उन चार अस्पतालों की जानकारी जुटाई जो ऐसा ट्रांसप्लांट कर रहे थे। हर जगह गया, डॉक्टर्स से मिला, लेकिन जब मैं डॉ. गौरव खरया से मिला, तो उनकी बातों में जो आत्मविश्वास और मानवीयता थी, उसने मुझे भरोसा दिया – "अक्षित की ज़िंदगी बच सकती है।"

लेकिन इलाज की क़ीमत?

डॉक्टरों ने बताया कि इस ट्रांसप्लांट की क़ीमत लगभग 40 लाख रुपए होगी। मेरे लिए तो ये रकम सुनना भी बोझ लग रहा था। फिर भी मैंने हार नहीं मानी।

मैंने प्रधानमंत्री राहत कोष, मुख्यमंत्री राहत कोष में आवेदन डाला। क्राउडफंडिंग शुरू की। दिन में दुकान चलाता और रात में लोगों को फ़ोन करता, मेल लिखता, सोशल मीडिया पर मदद माँगता।

करीब दो साल तक हम पैसे इकट्ठे करने में लगे रहे। 20-25 लाख रुपए तो किसी तरह हो गए, लेकिन शेष रकम के लिए हमनें स्थानीय नेताओं से संपर्क किया, एनजीओ से बात की, रिश्तेदारों से सहायता मांगी।

इसी दौरान अक्षित की तबीयत बिगड़ती रही। उसे बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूज़न की ज़रूरत होती थी।

अक्षित का चौथा जन्मदिन आया। उस दिन उसने मुझसे पूछा –

"पापा, क्या मैं ठीक हो सकता हूँ?"

उसका मासूम सवाल मेरे सीने में तीर की तरह चुभा। मैंने उसी दिन एक फेसबुक पोस्ट लिखी – पूरी दुनिया से मदद मांगी।

धीरे-धीरे लोग आगे आए। किसी ने ₹500 दिए, किसी ने ₹5000, और कुछ एनजीओ और भले लोगों ने बड़ी सहायता भी की।

आख़िरकार अक्षित का आधा मेल बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुआ। डॉक्टरों और टीम की मेहनत रंग लाई।

ट्रांसप्लांट के बाद भी हमारी ज़िम्मेदारियाँ कम नहीं हुईं। हमें 6 महीनों तक उसकी दवाइयों, सफाई, खानपान और मानसिक स्थिति का बेहद ध्यान रखना पड़ा। हमने कोई कसर नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे सुधार हुआ।

6 महीने बाद अक्षित की दवाइयाँ भी बंद हो गईं।

आज अक्षित स्कूल जाता है, खेलता है, पढ़ाई करता है और सबसे बड़ी बात – उसकी आंखों में अब डर नहीं, सपने होते हैं।

वो कहता है –"मैं बड़ा होकर डॉ. गौरव खरया जैसा बनना चाहता हूँ और बीमार बच्चों की मदद करना चाहता हूँ।"

मेरा दूसरा जीवन – जागरूकता का मिशन

मैं अब सिर्फ एक दुकानदार नहीं हूँ। मैं गाँव-गाँव जाकर लोगों को बताता हूँ कि थैलेसीमिया को रोका जा सकता है – एक साधारण ब्लड टेस्ट से।

प्री-मैरिटल या प्री-कॉन्सेप्शन स्क्रीनिंग से यह जाना जा सकता है कि माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हैं या नहीं। यदि दोनों माइनर हैं, तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का ख़तरा रहता है। साथ ही, मैं यह भी बताता हूँ कि अगर कोई बच्चा थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित है, तो अब हाप्लो आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसे विकल्प मौजूद हैं जो पहले सिर्फ एक सपना थे।

मैंने जब सोचा था कि अक्षित को मरने देना बेहतर होगा, तब शायद मैं डर और अज्ञानता में था। अगर मुझे सही जानकारी होती, तो शायद उस वक़्त मैं वो भयावह विचार न करता। आज जब अक्षित हँसता है, दौड़ता है, मुझसे मज़ाक करता है तो लगता है कि मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी जीत यही है।

अगर मेरी कहानी से एक भी परिवार जागरूक हो सके, एक भी बच्चा नया जीवन पा सके तो यही मेरी सबसे बड़ी स

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